Shreemad Devi Bhagvat Puran – देवीभागवत पुराण

Shreemad Devi Bhagvat Puran – देवीभागवत पुराण

Shreemad Devi Bhagvat Puran – देवीभागवत पुराण

* नारद जी द्वारा भगवती आद्याशक्ति के प्रभाव का वर्णन *

नारद जी बोले - हे व्यासजी! ब्रह्मलोक में अपने अमित तेजस्वी पिता ब्रह्मा के पास पहुँचकर यही प्रश्न पूछा था जो आज तुमने मुझ से पूछा है - हे पिताजी इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का आविर्भाव कैसे हुआ? इसका निर्माण आपने अथवा विष्णु ने अथवा शिव ने इसकी रचना की है और सर्वश्रेष्ठ ईश्वर कौन है किसकी आराधना की जानी चाहिए, मुझे बताइये ।

ब्रह्मा जी कहने लगे- हे पुत्र! तुमने आज एक दुरुह तथा उत्तम प्रश्न किया है, इनका निश्चित उत्तर तो विष्णु द्वारा दिया जाना संभव नहीं है, हे महामते ! इस संसार के क्रिया-कलापों में आसक्त कोई भी ऐसा नहीं है जो इस तत्व का ज्ञान रखता हो, कोई विरक्त निःस्पृह तथा विद्वेष रहित ही इसे जान सकता है।

प्राचीनकाल में जल-प्रलय के होने पर स्थावर जंगमादिक प्राणियों के नष्ट हो जाने तथा मात्र पंचमहाभूतों की उत्पत्ति होने पर मैं कमल से आविर्भूत हुआ। उस समय मैंने सूर्य, चन्द्र, वृक्षों तथा पर्वतों को नहीं देखा और कमल कर्णिका पर बैठा हुआ मैं विचार करने लगा। 

इस महासागर के जल में मेरा प्रादुर्भाव किससे हुआ ? 


मेरा निर्माण करने वाला, रक्षा करने वाला, तथा युगान्त के समय संहार करने वाला प्रभु कौन है ? कहीं भूमि भी स्पष्ट दिखाई नहीं दे रही है, जिसके आधार पर यह जल टिका है, तो फिर ये कमल कैसे उत्पन्न हुआ ? 

जिसकी उत्पत्ति जल और पृथ्वी के संयोग से ही होती है। आज मैं इस कमल का मूल आधार पंक अवश्य देखूँगा और फिर उस पंक की आधार स्वरूपा भूमि भी अवश्य मिल जायेगी ।

तदनन्तर मैं जल में नीचे उतर कर हजार वर्षों तक पृथ्वी को खोजता रहा, किन्तु जब उसे नहीं पाया तब आकाशवाणी हुई कि 'तपस्या करो' फिर मैं उसी कमल पर आसीन होकर हजार वर्षो तक घोर तपस्या करता रहा। 

Shreemad Devi Bhagvat Puran – देवीभागवत पुराण 


इसके बाद एक पुन: अन्य वाणी हुई 'सृष्टि करो' उसे सुनकर व्याकुल चित्त वाला मैं सोचने लगा, किसका पूजन और किस प्रकार करूँ? उसी समय मधु-कैटभ नाम वाले दो भयानक दैत्य मुझ से युद्ध के लिए तत्पर हो गये तो मैं अत्यधिक भयभीत हो गया। 

तत्पश्चात् मैं उसी कमल की नाल का आश्रम लेकर जल के भीतर उतरा, वहाँ मैंने एक अदभुत पुरुष को देखा । उनका शरीर श्याम वर्ण वाला था, वे पीत वस्त्र धारण किये हुए थे और उनकी चार भुजाएँ थी वे जगत्पत्ति वनमाला से अलंकृत थे तथा शेष-शैय्या पर सो रहे थे। 

वे शंख, चक्र, गदा, पद्य आदि आयुध धारण किये हुए थे । हे नारदजी ! हे योग निद्रा के वशीभूत होने के कारण निष्पन्द पड़े उन भगवान अच्युत को शेषनाग के ऊपर सोया हुआ देखकर मुझे अद्भुत चिंता हुई, तब मैंने निद्रा स्वरूप भगवती का स्मरण किया और उनकी स्तुति करने लगा मेरी स्तुति से वे कल्याणी भगवती विष्णु भगवान के शरीर से निकलकर आकाश में विराजमान हुई तो अनन्तात्मा मुक्त होकर उठ गये और उन्होंने पाँच हजार वर्षों तक जो वे दैत्य मुझे खोजते आ रहे थे उनके साथ घोर युद्ध किया । 

पुन: उन महामाया भगवती के दृष्टि पास से मोहित किये गये, तब कहीं उन दोनों दैत्यों को भगवान विष्णु ने मार दिया, अपनी जाँघों को विस्तृत करके विष्णु ने उसी पर दोनों का वध किया, उसी समय जहाँ हम दोनों थे, वहीं पर शंकरजी भी आ गये ।

तब हम तीनों ने गगन मण्डल में विराजमान उन मनोहर देवी को देखा | हम लोगों के द्वारा उन परम शक्ति की स्तुति किये जाने पर अपनी पवित्र कृपा दृष्टि से हम को प्रसन्न करके उन्होंने वहाँ स्थित हम लोगों से कहा- देवी बोली - हे ब्रह्मा, विष्णु, महेश ! अब आप लोग सृष्टि पालन और संहार के अपने-अपने कार्य प्रमाद रहित होकर कीजिए। 

Shreemad Devi Bhagvat Puran – देवीभागवत पुराण 

अब आप लोग अपना-अपना निवास बनाकर अपनी विभूतियों से अण्डज, पिण्डज, उद्भिज और स्वेदज चारों प्रकार की सभी प्रजाओं का सृजन कीजिए। 

उसी समय आकाश से एक रमणीक विमान आया और भगवती ने उनको उसमें बैठाकर कहा- हे ब्रह्मा विष्णु शिव मैं आप लोगों को आज इस विमान में एक अद्भुत दृश्य दिखाऊँ और उस विमान को अपनी शक्ति से आकाश मंडल में उड़ा दिया ।

ब्रह्माजी बोले- मन के समान वेग से उड़ने वाला वह विमान जिस स्थान पर पहुँचा वहाँ हमने जल नहीं देखा, वहाँ के वृक्ष सभी प्रकार के फलों से लदे हुए थे और कोकिलों की मधुर ध्वनि से गुंजायमान थे, वहाँ की भूमि, पर्वत, वन और उपवन ये सभी सुरम्य दृष्टि गोचर हो रहे थे। 

उस स्थान पर स्त्रियाँ, पुरुष, पशु, नदियाँ, बावलियाँ, कुएँ, तालाब, पोखरें तथा भरने आदि विद्यमान थे। वहाँ भव्य चाहरदीवारी से घिरा हुआ एक मनोहर नगर था जो यज्ञ शालाओं तथा अनेक प्रकार के दिव्य महलों से सुशोभित था ।

उस नगर को देखक हम लोगों को ऐसी प्रतीत हुई मानो यही स्वर्ग है । वहाँ आखेट के उद्देश्य से वन में जाते हुए एक देव तुण्य राजा को देखा, उसी समय हम लोगों को जगदम्बा भगवती भी विमान पर स्थित दिखाई पड़ी। 

थोड़ी ही देर बाद हमारा विमान वायु से प्रेरित होकर आकाश में उड़ते हुए मुहूर्त भर में वह पुनः एक अन्य सुरम्य देश में पहुँच गया। वहाँ पर अत्यंत रमणीक नन्दन वन दृष्टिगत हुआ। जिसमें पारिजात वृक्ष की छाया का आश्रय लिए हुए कामधेनु स्थित थी। 

कामधेनुके समीप ही चार दाँतों वाला ऐरावत हाथी विद्यमान था और वहाँ मेनकादि आदि अप्सराओं के समूह अपने नृत्यों तथा गानों में विविध भाव-भंगिमाओं का प्रदर्शन करते हुए अनेक प्रकार की क्रीड़ाएँ कर रहे थे 1

वहाँ मन्दार-वृक्ष की वाटिकाओं में सैकड़ों गन्धर्व, यक्ष और विद्या धर गा रहे थे और रमण कर रहे थे, वहाँ पर इन्द्र भगवान भी इन्द्राणी के साथ दृष्टिगोचर हुए। 

स्वर्ग में निवास करने वाले देवताओं को देख कर हमें परम विस्मय हुआ वहाँ पर वरुण, कुवेर, यम, सूर्य, अगिन तथा अन्य देवताओं को स्थित देखकर हम आश्चर्यचकित हुए, उसी समय उस सुसज्जित नगर से वह राजा निकला। 

Shreemad Devi Bhagvat Puran – देवीभागवत पुराण 

देवताओं के राजा इन्द्र की भाँति पराक्रमी वह राजा धरातल पर पालकी में बैठा था। वह विमान हम लोगों को लेकर द्रुत गति से ब्रह्मलोक में पहुँच गया, वहाँ पर सभी देवताओं से नमस्कृत ब्रह्माजी को विद्यमान देखकर भगवान शंकर एवं विष्णु विस्मय में पड़ गये। 

वहाँ ब्रह्माजी की सभा में वेद अपने-अपने अंगों सहित मूर्त रूप में विराजमान थे, साथ ही समुद्र नदियाँ, सर्प एवं नाग उपस्थित थे ।

तत्पश्चात् भगवान विष्णु और शंकर ने मुझ से पूछा- 

हे चतुर्भुज ! ये दूसरे सनातन ब्रह्मा कौन हैं? तब मैंने उनसे कहा कि मैं सबके स्वामी तथा सृष्टिकर्त्ता इन ब्रह्मा को नहीं जानता। हे ईश्वरो ! मैं कौन हूँ? ये कौन हैं? और हम दोनों का क्या प्रयोजन है? 

इसमें मैं मर्मज्ञ भ्रमित हूँ थोड़ी देर में विमान पुन: उड़कर कैलाश शिखर पर पहुँचा। उसी समय वृष पर आरूढ़, पंचमुख, दस भुजाओं वाले, मस्तक पर अर्धचन्द्र धारण किये हुए, भगवान शंकर अपने दिव्य भवन से बाहर निकले, वे व्याघ्रचर्म पहने हुए तथा गज चर्म ओढ़े हुए थे। 

महाबली गजानन ( श्री गणेश) तथा षटानन (कार्तिकेय) उनके अंग रक्षक के रूप में विद्यमान थे । वहाँ अन्य लोगों तथा शंकर को मातृकाओं सहित देखकर हम लोग विस्मय में पड़ गये, फिर वह विमान उस कैलाश - शिखर से वायुगति से भगवान विष्णु के बैकुण्ठ लोक में जा पहुँचा, उस नगर को देखकर विष्णु विस्मय में पड़ गये, उसी समय कमललोचन भगवान विष्णु अपने भवन से बाहर निकले, उनका वर्ण अलसी के पुष्प की भाँति श्याम था, वे पीताम्बर धारण किये हुए थे, उनकी चार भुजाएँ थी और पक्षीराज गरुड़ पर आरूठ थे।

दिव्यालंकारों से विभूषित भगवती लक्ष्मी उन्हें शुभ चँवर डुला रहीं थी। हम सभी को महान आश्चर्य हुआ एक-दूसरे को देखते हुए हम अपने अपने आसनों पर बैठे रहे। इसके बाद वह विमान वायु सदृशद्रुत गति से पुन: चल पड़ा। 

कुछ ही क्षणों में विमान मधुर जल वाले, ऊँची-ऊँची लहरों वाले नाना विधि जल जन्तुओं से युक्त तथा चंचल तरंगों से शोभायमान अमृत-सागर के तट पर पहुँच गया।

उस सागर के तट पर विभिन्न पंक्तियों में नाना प्रकारके विभिन्न रंगों वाले मन्दार एवं पारिजात आदि वृक्ष शोभायमान थे, समुद्र के सभी ओर अशोक, मौलिसिरी, कुरबक, आदि वृक्ष विद्यमान थे, उसके चारों ओर चित्ताकर्षक केतकी तथा चम्पक पुष्पों की वाटिकाएँ थीं जो कोयलों की मधुर ध्वनियों से गुंजित तथा नाना प्रकार की दिव्य सुगन्धि से परिपूर्ण थीं। उस द्वीप में हम लोगों ने दूर से ही विमान पर बैठे-बैठे शिवजी के आकार वाला एक मनोहर तथा अत्यंत अद्भुत पलंग देखा जो रत्नमालाओं से जड़ा हुआ था। 

उस पलंग पर अनेक प्रकार के रंगों वाली आकर्षक चादरें बिछी थी तथा एक दिव्यांगना बैठी हुयी थी । उस देवी ने रक्त पुष्पों की माला तथा रक्ताम्बर धारण किया था । 

उसने अपने शरीर में लाल-चन्दन का लेप कर रखा था । 


लालिमापूर्ण नेत्रों वाली वह देवी असंख्य विद्युत की कांति से सुशोभित हो रही थीं । सुन्दर मुख वाली, रक्तिम अधर से सुशोभित लक्ष्मी से करोड़ गुना अधिक सौन्दर्य शालिनी वह स्त्री अपनी कांति से सूर्यमण्डली की दीप्ति को भी मानों तिरस्कृत कर रही थीं। 

वह पाश, अंकुश और अभय मुद्रा को धारण करने वाली तथा मधुर मुस्कान युक्त वे भगवती भुवनेश्वरी हमें दृष्टिगोचर हुई । जिन्हें पहले कभी नहीं देखा गया था ।

ह्रींकार बीज मंत्र का जप करने वाले पक्षियों का समुदाय उनकी सेवा में निंरतररत था । नवयौवन से सम्पन्न तथा अरुण-आभा वाली वे कुमारी साक्षात् करुणा की मूर्ति थीं, उनके उन्नत वक्षस्थल कमल की कलियों से भी बढ़कर शोभायमान हो रहे थे। 

नाना विधि मणियों में जटिल आभूषणों से वे अलंकृत थीं, स्वर्ण निर्मित कंकण, केयूर और मुकुट आदि से सुशोभित थीं, स्वर्ण निर्मित चन्द्राकार कर्णफूल से सुशोभित अनका मुखारबिन्द अतीव दीप्तिमान था । उनकी सखियों का समुदाय 'हल्लेखा' तथा 'भुवनेशी' नामों का सतत जप कर रहा था। वे षटकोण के मध्य में यन्त्रराज के ऊपर विराजमान थीं ।

Shreemad Devi Bhagvat Puran – देवीभागवत पुराण 


उन भगवती को देखकर हम सभी आश्चर्यचकित हो गये, यह नहीं जान पाये कि वे सुन्दरी कौन हैं तथा क्या नाम है ? दूर से देखने पर वे भगवती हजार नेत्र, हजार मुख और हजार हाथों से युक्त अति सुन्दर लग रही थीं। 

ये कौन हो सकती है। ये ही विष्णु ने अपने अनुभव से मन में निश्चित करके कहा- ये साक्षात् भगवती जगदम्बाहम सबकी कल्याण स्वरूपा है। ये ही महाविद्या, महामाया, पूर्णा तथा शास्वत प्रकृति रूप हैं। ये देवी परमात्मा की इच्छा स्वरूप तथा नित्य-नित्य स्वरूपिणी है। 

ये विश्वेश्वरी कल्याणी भगवती अल्प भाग्य वाले प्राणियों के लिए दुराराध्य है। ये वेद जननी जगदम्बा सबकी आदि स्वरूपा ईश्वरी है। प्रलयवस्था में विश्व का संहार करके सभी प्राणियों के लिंग रूप शरीर को अपने शरीर में समाविष्ट करके विहार करती है । 

हे ब्रह्मा एवं शंकरजी! देखिए दिव्यगंधानु लेपन से युक्त ये सभी विभूतियाँ इन भगवती की सेवा में मनोयोग से संलग्न है। हम लोग घन्य, सौभाग्यशाली तथा कृत-कृत्य है जो कि हमें इस समय यहाँ भगवती का साक्षात् दर्शन प्राप्त हुआ।

ये ही मूल प्रकृति स्वरूपा भगवती परम पुरुष के सहयोग से ब्रह्माण्ड की रचना करके परमात्मा के समक्ष उसे उपस्थित करती है । हे देवो ! यह सब दृष्टामात्र है और समस्त ब्रह्माण्ड तथा देवतागण दृश्य स्वरूप है, महामाया, कल्याणमयी, सर्वव्यापिनी, सर्वेश्वरी ये भगवती ही इन सबका मूल कारण है। 

कहाँ मैं, कहाँ सभी देवता और कहाँ रम्भा आदि देवांगनाएँ । 


हम सभी इन भगवती की तुलना में उनके लाक्षांश के बराबर भी नहीं है । ये वे ही महादेवी जगदम्बा है जिन्हें हम लोगों ने प्रलय सागर में देखा था । और जो बाल्यावस्था में मुझे प्रसन्नतापूर्वक पालन में झूला रही थीं। 

उस समय मैं एक सुस्थिर तथा दृढ़ वट पत्ररूपी पलंग पर सोया हुआ था और अपने पैर का अंगूठा अपने मुखार बिन्द में डालकर चूस रहा था। अत्यंत कोमल अंगों वाला मैं उस समय अनेक बाल सुलभ चेष्टाएँ करता हुआ उसी बट पत्र के दोनें में पड़े-पड़े खेल रहा था।

उस समय गाती हुई ये भगवती बाल-भरव में स्थित मुझे झूला झुलाती थीं, इन्हें देखकर मुझे यह सुनिश्चित ज्ञान हो गया कि वे ही यहाँ विराजमान है। निश्चित रूप मेरी भगवती में से जननी हैं। आप सुनें मुझे पूर्व अनुमत की स्मृति जग गई है जो मैं आपसे कहता हूँ।

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