ज्ञानवर्धन करने वाली हैं यह 2 कहानियां gyanvardhak kahaniyan hindi mein

ज्ञानवर्धन करने वाली हैं यह 2 कहानियां gyanvardhak kahaniyan hindi mein

ज्ञानवर्धन करने वाली हैं यह 2 कहानियां gyanvardhak kahaniyan hindi mein

  • धन से बुद्धि बड़ी होती है।

किसी गांव के दो मनुष्यों में झगड़ा हुआ एक का नाम धनपति राय और दूसरे का नाम बुद्धि सागर था ।

धनपति राय कहता था कि धन बड़ा है और धन ही के प्रताप से बुद्धि होती है और धन ही से बहुत से कम सहज में सिद्ध हो जाते हैं। परंतु बुद्धि सागर कहता था की बुद्धि बड़ी है और मनुष्य की सर्वश्रेष्ठ संपत्ति बुद्धि ही है।

धन को चोर ले जाता है और वह नष्ट भ्रष्ट भी हो जाता है परंतु बुद्धि को ना कोई ले सकता है और ना कोई बांट सकता है ना राजा छीन सकता है और मनुष्य बुद्धि के प्रताप से इस अपार संसार से पार हो सकता है।

अर्थात जो भगवान अज अविनाशी अलख अगोचर है वे सहज में ही बुद्धि के द्वारा पास आकर मिल सकते हैं परंतु धन से भगवान नहीं मिल सकते। दोनों का तर्क वितर्क का यह झगड़ा राजा के पास गया।

राजा ने क्रोधित होकर कहा कि फला देश का राजा तुम्हारा इंसाफ करेगा। तुम हमारे पत्र को लेकर वहां जाओ राजा ने समाचार पत्र में अपने मित्र राजा को लिखा कि आप इन दोनों मनुष्यों को आते ही फांसी लगवा देना।

पत्र को लेकर दोनों मनुष्य गए और राजा को प्रणाम करके वह समाचार पत्र राजा को दे दिया । राजा ने अपने मित्र राजा का पत्र पढ़कर विचार किया कि इसमें ऐसा कोई कारण अवश्य है कि अपने यहां फांसी न देकर हमारे देश में यह अपराधी भेजे हैं।

शायद उनके देश में फांसी न दी जाती हो इसी कारण उन्होंने अपराधियों को हमारे यहां भेजा है।

ऐसा निर्णय करके उनको हुक्म दिया कि फलां तारीख को तुम्हारी फांसी होगी। यह कहकर उनको हवालात में बंद कर दिया।

अब धनपति राय जी फूट-फूट कर रोने लगे बुद्धि सागर ने अत्यंत समझाया कि भाई साहब रोने से प्राण दान नहीं मिल सकता इसलिए रोना छोड़कर खूब हंसो।

एक युक्ति है कि मैं आपसे पूछूंगा कि कह दूं तो आप हंसकर कह देना कि कदाचित नहीं । इस प्रयत्न से तो प्राण दान मिल भी सकता है वरना और कोई उपाय नहीं जिसमें की प्राण बच जाए ।

धनपति राय ने बुद्धि सागर की बात मान ली और रोना को छोड़कर खूब हंसने लगे। बुद्धि सागर ने कहा कि कह दूं। तब धनपति राय बोले कि कदापि नहीं ।

जो कोई उनके पास आता तो वह इसी प्रकार हंसते थे जब इस प्रकार उनका हंसना देखा तो उन्होंने यह वृत्तांत राजा के पास पहुंचाया।

राजा ने अपने सचिव को उनके पास भेजा मंत्री भी उनके पास आ गए तो उन्होंने मंत्री के सामने भी ऐसा ही कहा मंत्री भी अचंभित होकर राजा के पास गए और सारा वृत्तांत कह सुनाया की हे श्री महाराज इसमें कोई कारण छिपा हुआ अवश्य है।

की दुख के समय इसके बदन पर छाई हुई खुशी है यह समाचार सारे नगर में फैल गया है कि फलादेश के दो अपराधी फांसी लगने को यहां पर आए हैं और खूब हंसते हैं ।

राजा ने विचार करके उनको दरबार में बुलाया सारे कर्मचारी और नगर निवासी एकत्रित हुए और उन दोनों को वहां पर बुलाया गया तब यह सभा में खूब हंसे और बुद्धि सागर बोला कह दूं तो धनपति राय ने कहा भूलकर भी नहीं।

राजा ने अचम्भित होकर उनसे बहुत कुछ पूछा तो बुद्धि सागर ने कहा कह दूं और धनपत राय ने कहा कि नहीं।

यह सुनकर राजा ने उनसे बहुत पूंछा तो बुद्धि सागर बोला कि महाराज बताने में हमारे महाराज की हानि है।

परंतु राजा के अनेक बार कहने से बुद्धि सागर ने कहा कि हे नाथ हमारे राजा से एक महात्मा ने कहा है कि जिस राज्य में तुम अपने अपराधियों को फांसी लगवाओगे वहीं राज्य तुम्हारा हो जाएगा इस कारण हम यहां पर भेजे गए हैं।

राजा ने प्रसन्न होकर कहा कि इनको दो लाख रुपये देकर देश से निकाल दो। दोनों रुपए लेकर भाग गए धनपति राय बहुत खुश हुआ और दोनों अपने राजा के पास आए।

राजा ने कहा कि तुम्हारा न्याय हो गया तब भी यह बुद्धिहीन धनपति राय बोला महाराज इंसाफ क्या वहां तो जान के लाले पड़ गए और जैसे तैसे जान बचाई है।

यह सारा वृतांत सुनकर राजा ने क्रोधित हो धनपति राय को खूब पीटा और न्याय समझा दिया और अंत में दोनों अपने-अपने घर आए।

इससे यह सिद्ध हुआ की बुद्धि के आगे धन की तो कुछ नहीं चलती। धन सांसारिक सुखों में मनुष्य का मुख्य है परंतु बुद्धि सांसारिक सुखों के लिए तथा पारलौकिक सुखों के लिए प्रधान है।

इससे सिद्ध हुआ कि धन से बुद्धि बड़ी होती है।

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  • महात्मा जैमिनी

एक दिन व्यास जी महाराज ने जैमिनि को समझाया कि यद्यपि इंद्रियों के द्वारा विषयों को ना ग्रहण करने वाले पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत हो जाते हैं परंतु राग नहीं निवृत्त होता और यत्न करते हुए बुद्धिमान पुरुष के भी मन को यह प्रमथन स्वभाव वाली इंद्रियां हर लेती हैं। बड़े-बड़े विद्वानों को भी मोहित कर लेती हैं।

परन्तु जैमिनि इस बात को ना माना। व्यास जी ने बहुत समझाया परंतु जैमिन के समझ में ना आया अंत में व्यास जी ने कहा कि फिर कभी इसको समझा देंगे।

यह कहकर वे चल दिए संध्या समय कुछ बादल हो गए और बूंदें पढ़ने लगी, तूफान भी आया उसी वक्त व्यास जी ने माया की दस ग्यारह नव युवक स्त्रियां प्रकट की और उनके पीछे आपने भी महान सुंदर स्त्री का रूप धारण करके जैमिनी अपने शिष्य के आश्रम की तरह आगमन किया।

हवा के झोंकों द्वारा महीन वस्त्र उलट-पुलट जाने से उनके अंग पर जैमिनी की नजर पड़ी। अंत में वे आगे गेंद खेलती हुई चली गई। इसके पश्चात व्यास जी स्त्री का रूप बनाए हुए आए और बोले की हे महाराज हमारी सहेलियां विछुड गई हैं और रात्रि हो गई है इस कारण मैं आपकी आश्रम में रहना चाहती हूं।

जैमिनी ने बहुत मना किया परंतु उसने कहा कि मेरा धर्म बिगड़ने का पाप या किसी जानवर द्वारा खा लेने से स्त्री हत्या का पाप तुमको लगेगा।

जैमिनी ने सोच समझकर उनका एक कोठरी बतला दी और अपने मन को बस में करने का प्रयत्न करने लगे।

फिर उससे बोले कि यहां पर जैमिनी नाम का एक भूत आता है इस कारण तुम मेरा नाम लेने पर भी किवाड़ ना न खोलना।

व्यास जी अपना असली रूप बनाकर भीतर भजन करने लगे । जब रात्रि में जैमिनी को उन दस ग्यारह स्त्रियों की याद आई तो विषय वासना की लालसा उत्पन्न हुई और दरवाजे पर जाकर बोले हे प्रिये मैंने तुमको व्यर्थ ही धोखा दिया था यहां पर कोई भूत नहीं आता है।

किवाड खोल दीजिए परंतु उन्होंने किवाड ना खोली अंत में इंद्रियों ने विषय लवलीन होकर मन को बस में कर लिया और जैमिनी छत काटकर उसमें कूद पड़े।

वहां देखते हैं कि व्यास जी महाराज विराजमान हैं। व्यास जी ने क्रोधित होकर दो तमाचे जैमिनी में दिए और कहा इंद्रियां विषय लवलीन होकर बुद्धिमान पुरुष के मन को हर सकती हैं या नहीं ?

जैमिनी हाथ जोड़कर चरणों में गिर पड़ा और क्षमा मांगने लगा।

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