Inspirational Story in Hindi विद्यार्थी के लिए प्रेरणादायक कहानी

Inspirational Story in Hindi  विद्यार्थी के लिए प्रेरणादायक कहानी

Inspirational Story in Hindi  विद्यार्थी के लिए प्रेरणादायक कहानी

  • होनहार बालक

गुरु द्रोणाचार्य के पास बहुत से राजकुमार पढ़ते थे युधिष्ठिर उन सब में बड़े थे । उनकी पहली पुस्तक पहला पाठ था कि मनुष्य को क्रोध त्याग देना चाहिए क्योंकि क्रोध के समान कोई दुष्ट नहीं जो कि स्वयं अपनी हृदय आत्मा को भक्षण कर जाता है।

युधिष्ठिर ने इस वाक्य को अटल कर लिया चाहे जान चली जाए परंतु क्रोध न करूंगा और जब तक क्रोध को जीत ना लूंगा तब तक आगे पढ़ना व्यर्थ है।

यह कहकर उन्होंने पढ़ना बंद कर दिया। एक महीने बाद परीक्षक ने उन सब की परीक्षा ली। सब ने अपने पाठ सुना दिए परंतु धर्मराज ने कहा कि मुझे पहला ही पाठ याद है और नहीं।

परीक्षक को क्रोध आया और बेंत मारना आरंभ कर दिया। परीक्षक मारते-मारते थक गए परंतु युधिष्ठिर के चेहरे पर क्रोध की भनक भी ना दिखाई पड़ी।

तब परीक्षक ने द्रोणाचार्य को बुलाकर कहा कि उधिष्ठिर सब राजकुमारों में बड़े हैं और एक दिन इनको भारत का सम्राट होना है। परंतु इन्होंने सबसे कम वाक्य सीखें हैं ।

तब द्रोणाचार्य ने कहा कि हम ही भूल पर हैं इन्होंने पहले वाक्य को अपने आचरण में उतार लिया है। कि इतने पीटने पर भी उनके चेहरे पर क्रोध का नाम और निशान भी नहीं है।

परीक्षक यह सुनकर लज्जित हुए और क्षमा मांगने लगे।

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  • होनहार बालक गोपाल कृष्ण गोखले

गोपाल कृष्ण गोखले मराठी की चौथी कक्षा में पढ़ते थे। तब गुरु जी ने एक दिन अंक गणित के कुछ प्रश्न घर पर हल करने को दिए। किसी प्रश्न को वो खुद हलना किया और वह उन प्रश्नों को किसी दूसरे आदमी के द्वारा हल करा के स्कूल में ले गए।

गुरु जी ने इनका पहला नंबर दिया और प्रशंसा करने लगे। तब वह रोने लगे। गुरु जी ने उन्हें बहुत समझाया कि गोपाल तुम तो अपने प्रश्न हल कर ले आये हो और तुमको नंबर भी पहला मिला है फिर भी तुम क्यों रोते हो?

तुमको देखकर अन्य विद्यार्थियों को रोना चाहिए। गोपाल और भी रोने लगे और बोले की हे गुरु जी महाराज मैं स्वयं प्रश्न हलकर के नहीं लाया था दूसरे से हल कराकर लाया था।

इस कारण मुझे पहला नंबर नहीं देना चाहिए। मैंने आपको धोखा दिया इसलिए कृपा कर मेरा अपराध क्षमा कीजिए। मैंने आपको धोखा दिया।

यह सुनकर सब विद्यार्थी चकित हो गए । गुरु ने उसको प्रसन्न देखकर कहा कि सच्चाई इसका नाम है। अन्त में यही गोपाल कृष्ण गोखले बड़े होकर वायसराय की काउंसिल के बड़े सदस्य हुए हैं

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  • होनहार बालक शिवाजी

शिवाजी एक बार 12 वर्ष की ही उम्र में अपनी माता के साथ बीजापुर गए। वहां उनके पिता बादशाह आदिलशाह के यहां रहता था। जब शिवाजी की भेंट बादशाह से हुई तब उन्होंने निडर होकर बादशाह को साधारण तौर से सलाम किया।

बादशाह इस बर्ताव से अवश्य क्रोधित होता परंतु उसने शिवाजी को नादान बालक समझकर क्षमा कर दिया।

एक बार दरबार में शिवाजी को क्रोधित देखकर बादशाह पूंछा की तुम क्रोधित क्यों हो ? तब शिवाजी ने कहा कि यहां खुले बाजार गौ मांस बेचा जाता है। हम हिंदू लोग इसे नहीं देख सकते।

इस बात की पुष्टि अन्य हिंदू सरदारों ने भी की । इस पर बादशाहू हुकुम से सब सड़कों पर गौ मांस बेचना बंद हो गया।

एक दिन अकस्मात एक कसाई सड़क पर गौ मांस बेंचता मिल गया शिवाजी ने उसका सिर काट लिया।

इस पर बादशाह ने कह दिया जो जैसा करेगा वैसा ही फल पाएगा। इसने बादशाही आज्ञा का उल्लंघन क्यों किया ?

वहीं वीर शिवाजी अपनी बहादुरी के कारण से दक्षिणी भारत के राजा हुए । इसी से तो कहते हैं कि कर्मों को देखकर चतुर आदमी ताड़ जाते हैं यह बड़े होने पर किस ढंग का आदमी होगा। इसके ऊपर क्या ही अच्छी कहावत है- होनहार वीरवान के होत चिकने पात।

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  • एकाग्रता

चंचल मन को स्थिर करके अपने काम में लगा रहना ही एकाग्रता है । जो मनुष्य दृढतापूर्वक एकाग्रचित से अपने काम में अटल रहता है। सफलता हर समय उसके साथ खड़ी रहती है।

मनुष्य चाहे विचारशील हो चाहे परिश्रमी हो परंतु बिना एकाग्रता के वह अपने काम में सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। यह विद्वानों का मत है कि महाराज द्रोणाचार्य कौरव और पांडवों को धनुष विद्या सिखाया करते थे।

एक दिन गुरु जी ने उनकी परीक्षा ली। एक मैदान में एक पेड़ के ऊपर बनावटी चिड़िया स्थापित की और आज्ञा दी कि इसके नेत्र बध करो ।

उस समय सब राजकुमार प्रस्तुत हुए। तब गुरु जी ने एक-एक से पूछा कि तुमको इस पेड़ पर क्या दिखाई देता है। सब ने कहा चिड़िया फिर अंत में अर्जुन को पूछा गया।

अर्जुन ने कहा कि मुझे चिड़िया की आंख के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता है। अंत में गुरु जी ने कहा कि अर्जुन ही चिड़िया की आंख बध कर सकता है और कोई राजकुमार इसमें सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। आखिरकार अर्जुन ने ही चिड़िया की आंख में तीर मार दिया।

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  • एकाग्रता ही सफलता की कुंजी है-

पूर्व समय में यूनान में एक प्रसिद्ध गणितज्ञ आरकेमेडींज था। एक बार यूनान के बादशाह के पास एक स्वर्ण का ताज आया। बादशाह ने उस ताज की परीक्षा के लिए की यह नकली है या असली आरकेमेडींज को बुलाया।

वह बहुत दिन तक इस बात पर निर्णय करता रहा। एक दिन स्नान करते समय बादशाह के प्रश्न का उत्तर याद आया वह फौरन ही राजा के पास नंगा दौड़ा गया। वह एकाग्रता में इतना लवलीन था कि कपड़े पहनने की उसको सुधि तक नहीं रही।

इसी प्रकार वह अपने मकान में बैठा हुआ गणित का एक प्रश्न हलकर रहा था उसी समय यूनान के दुश्मन यूनान पर चढ़ाई कर दिये और मार काट करने लगे।

तब वे आरकेमेडींज के पास मारने को दौड़े तो उसने कहा भाई थोड़ी देर ठहरो मुझे अपना प्रश्न हल कर लेने दो।

देखिए इसी का नाम एकाग्रता है। इसमें अनुरूक्त रहने के कारण शिक्षाप्रद आरकेमेडींज का दृष्टांत चला आ रहा है। जिसको बहुत से चतुर मनुष्य आचरण मे लाकर अपने काम में कृतार्थ होते हैं।

एकाग्रता के महत्व का प्रमाण वेद पुराण भी देते हैं कि बड़े भारी ब्रह्मवेत्ता ऋषि दत्तात्रेय जी ने एक साधारण तीर बनाने वाले मनुष्य को गुरु बनाया था।

इसकी कथा इस प्रकार है कि एक बार शहर के राजा की सवारी बड़ी धूमधाम के साथ निकल रही थी। शहर के मनुष्य सभी उसका तमाशा देख रहे थे।

उसी समय ऋषि दत्तात्रेय वहां निकले और उस वक्त उन्होंने देखा कि एक तीर बनाने वाला तीर बन रहा था वह बिल्कुल एकाग्रचित्त है। राजा की और उसका बिल्कुल ध्यान नहीं वह अपनी धुन में मस्त है ।

दत्तात्रेय ने उसे अपना गुरु बनाया क्योंकि उसमें एकाग्रता का गुण था। कहने का तात्पर्य यह है- संसार में ऐसा कोई कार्य नहीं कि जिसे मनुष्य एकाग्रता के गुण से पूरा न कर सके। कठिन से कठिन कार्य एकाग्रता से सहज ही में हो जाते हैं।

इसलिए इसे यह शिक्षा प्राप्त होती है कि सबको अपने हृदय में एकाग्रता का गुण रखना चाहिए। चाहे जैसा काम आरंभ करो उसे एकाग्रचित्त होकर शुरू करो। उसमें अवश्य ही सफलता प्राप्त होगी वेद पुराण भी इसके साक्षी हैं।

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