यह प्रसिद्ध तीन कहानियां आपको जरूर पढ़ना चाहिए prasidh hindi kahaniya

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1 - लोभ से बनावटी बातों पर विश्वास ना करो

एक बहेलिया वृक्ष पर बैठी हुई एक चिड़िया को जाल में फंसा कर ले आया और मार्ग में हर्ष पूर्वक जा रहा था चिड़िया ने कहा कि तुम मुझे लेकर अवश्य ही मारोगे। इससे मैं मरने से पहले ही एक शिक्षाप्रद बात बतलाती हूं किसी लोभ से कभी किसी की बनावटी बातों पर विश्वास न करना। 

बहेलिया ने कहा बहुत अच्छा थोड़ी दूर पर चलकर चिड़िया ने फिर कहा कि मैं इस समय मोती निकालूंगी इसलिए तुम मुझे कुछ ढीला कर दो। 

बहेलिया चिड़िया की शिक्षाप्रद बातों को भूलकर 

लोभ में आकर उसे ढीला कर दिया वह तुरंत ही उड़ कर पेड़ पर बैठ गई और बोली कि तुम तो मेरी बातों को थोड़ी ही देर में भूल गए। 

बहेलिया यह सुनकर लाचार हो गया और अपने घर लौट आया इस कहानी से यह तात्पर्य निकला कि कभी किसी के लोभ भरी बातों में ना आना चाहिए क्योंकि लोभ की नाव डूबती है। 

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2- सांसारिक नाता सत्य है या असत्य

महाराज परीक्षित ने पूछा कि हे मुनिनाथ सांसारिक जो नाता है वह सत्य है या असत्य है ? इस पर सुखदेव जी बोले कि ईश्वर के साथ जो नाता है वही सत्य है और सब नाते असत्य हैं।

जैसे कि एक मनुष्य एक महात्मा के पास चेला होने के लिए गया महात्मा ने उसको अपना चेला बनाकर प्राणायाम बढ़ाना तथा उतारना और मरे हुए को जीवित करना यह सब विद्याएं सिखला दी। 

एक दिन महात्मा ने कहा कि संसार में ना कोई किसी का बाप है ना माता सब स्वार्थी है यह जीव तो आदि से ही सनातन है जब तक संसार में जीवन है तभी तक का यह नाता है। 

यह सुनकर चेला बोला कि हे नाथ मेरे तो बाप तथा माता भाई कुटुंबी स्त्री और बहन सब अति प्रिय है और वह भी मुझे प्राणों से प्यारा समझते हैं। 

महात्मा ने कहा कि बच्चा यह स्वार्थी प्यार है परंतु चेला ने इस बात को ना माना तब महात्मा ने कहा कि तुमको हम परीक्षा करके दिखला सकते हैं कि कोई किसी का नहीं। 

तुम अपने घर जाकर प्राणायाम चढ़ा लेना तब मैं तेरे माता-पीताओं की परीक्षा लूंगा एक जहर के कटोरा को जब तेरा कोई ना पिएगा तब मैं ही पी लूंगा और प्राण त्याग दूंगा फिर तुम धीरे-धीरे अपने प्राण उतार लेना और विद्या से मुझे भी जीवित कर लेना। 

महात्मा की इस बात को सुनकर शिष्य चल दिया 

और अपने घर प्राणायाम चढ़ा कर लेट गया उसके घरवाले उस पुत्र को मरा हुआ जानकर चिल्लाने लगे। पीछे से वही महात्मा वहां आए और उसके घर वालों को बहुत ही समझाया परंतु उसकी समझ में कुछ नहीं आया। 

तब महात्मा ने सब कुटुंबियों के सामने कटोरा लेकर पानी में जहर मिला दिया और उसकी माता से कहा कि पुत्र के साथ माता का तो अतुलिनीय प्रेम होता है। इसलिए यदि तुम अपने पुत्र को जीवित चाहती हो तो इस जहर के प्याले को पी लीजिए तुम मर जाओगी और तुम्हारा पुत्र बच जाएगा। 

तुम्हारे मरने का समय भी है यह सुनकर माता ने उत्तर दिया कि मैं इस प्याले को नहीं पी सकती इसके मरने से क्या हुआ मेरे उदर से और पुत्र ही उत्पन्न हो जाएंगे। मैं अपने प्राण क्यों दूं? हम तो लकीर फकीर होकर शोक मनाते हैं। 

फिर महात्मा ने पुत्र के पिता से वही प्रश्न किया पिता ने कहा कि यह पुत्र नहीं था पूर्व जन्म का दुश्मन था जो बदला लेकर चला गया मैं इसके पीछे वृथा ही क्यों प्राण दूं। 

मेरे और ही पुत्र उत्पन्न हो जाएंगे इसके पश्चात महात्मा ने उसकी बहन से प्याला पीने को कहा परंतु उसने भी इंकार कर दिया कि मेरे और भी भाई उत्पन्न हो जाएंगे। फिर महात्मा ने उसकी स्त्री को बुलाकर समझाया स्त्री का धर्म है कि पति की सेवा करे। 

इसलिए तुम पति के कार्य में प्राण दान करो और स्वर्ग को जो इस पर स्त्री ने कहा कि जो आया है सो अवश्य ही जाएगा इसमें कोई संसय नहीं। इस कारण पति के मरने का मुझे कोई दुख नहीं है मरना तथा जन्म लेना यह तो सांसारिक नियम है। 

हानि लाभ जीवन मरण व यस और अपयस सब विधाता के हाथ में है 

इसलिए मैं अपने प्राण नहीं दे सकती महात्मा इन बातों को सुनकर हंसे और कहा कि कुटुंबियों तुम लोगों में से कोई इस प्याले को पी सकता है ?

सब ने कहा नहीं जब इसके माता-पिता ने ही नहीं पिया तो हम क्यों जहर पिएं महात्मा ने बात ही बात में उसे प्याले के जल को पी लिया और प्राण त्याग दिए। 

इसके बाद वह शिष्य ने धीरे-धीरे अपने प्राण उतार लिए और परीक्षा देखकर हर्षित हुआ उसने अपने विद्या के बल से महात्मा को भी जिला लिया। 

तब महात्मा ने कहा बच्चा सांसारिक नाताश सत्य है या असत्य? चेला लज्जित हो गया और उसी दिन से मोह त्याग विरक्त हो गया। 

इस कहानी से यह ज्ञान मिलता है कि जीव और ईश्वर के साथ में जो नाता है वह सत्य है और सब सांसारिक नाते असत्य हैं और जगत के यह सब पदार्थ मिथ्या तथा सार रहित हैं।

यह मृगतृष्णा जल के समान है और झूठ में मनुष्य तथा सीप में चांदी मालूम होना यह सब मिथ्या है वास्तव में यह सत्य नहीं परंतु अज्ञानता के कारण सत्य प्रतीत होते हैं बस यही संसार का हाल है ।


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3- भक्त बड़े हैं भगवान से

एक बार अरब के बादशाह का पुत्र मर गया तो बादशाह को बहुत शोक हुआ और शहजादे की माता तो शोक में पागल हो गई अंत में सात दिन बीतने पर बादशाह ने एक नाव में तेल भरवा कर उस शहजादे को रख रख दिया और अपना दरबार जोड़ा। 

उसमें बहुत से फकीर मौलवी और काजी मातम के लिए आए तब बादशाह ने प्रश्न किया कि कुरान शरीफ में लिखा है कि फकीर उसी का नाम है जो मरते को जिंदा तथा जिंदे को मार दे। 

इस कारण एक साल के अंदर ऐसा ही फकीर लाओ नहीं तो मैं सब मौलवी फकीरों को कत्ल करा दूंगा बादशाह के इन बातों को सुनकर सभा में सन्नाटा छा गया। और सब काठ की मूर्ति के सामान दिखने लगे काटो तो उसके शरीर में रुधिर नहीं और अपनी जान बचाने का प्रयत्न करने लगे। 

फिर उन्होंने ऐसे फकीर की तलाश को देश-देश में भ्रमण करने के लिए नेता चुने भारतवर्ष में जो नेता आया था उसका नाम फैजी था। 

हर एक नेता के खाने को तथा घर के प्रबंध को बादशाह ने रुपए दिए जिस समय फैजी भारतवर्ष में आया था उस समय यहां अकबर बादशाह का शासन प्रबंध था। 

फैजी दिल्ली गया और बादशाह को सारा वृत्तांत सुनाया तब अकबर ने अपने प्रधान प्रतिनिधि बीरबल को बुलाकर फैजी का सारा संदेश सुनाया। तब बीरबल ने कहा कि हमारे देश में ऐसे अनेक फकीर होंगे जो मरे को जिंदा कर दें परंतु मैं ऐसे तीन फकीरों का नाम जानता हूं। 

पहले वृंदावन में सूरदास जी , दूसरे श्री अयोध्या जी में गोस्वामी तुलसीदास जी, तीसरे शिवपुरी अर्थात काशी में महात्मा कबीर दास जी। 

यह सुनकर बादशाह ने एक पत्र लिखकर फैजी को दिया 

और वृंदावन में सूरदास जी के पास भेज दिया फैजी वहां जाकर सूरदास जी को बादशाह का पत्र दिया। महात्मा जी ने पत्र पढकर उत्तर दिया कि मधुसूदन श्री वृंदावन बिहारी की कृपा से यह काम तुच्छ है। 

परंतु में 84 कोश ब्रजमंडल को त्याग कर दूसरी जगह नहीं जा सकता हूं यदि आप शहजादे को वृंदावन ले आये तो यह सब काम सिद्ध हो सकता है। 

यह सुन फैजी अयोध्या पहुंचा और वही बादशाह पत्र महात्मा तुलसीदास जी को दिया पत्र को पढ़ते ही महात्मा जी ने उत्तर दिया कि मेरा हिंदू धर्म है और अरब में मुस्लिम धर्म है अस्तु वहां जाने को मेरा चित्त तैयार नहीं होता। 

यदि आप शहजादे को यहां लाओ तो श्री राम की कृपा से जीवित हो सकता है कोई काम भगवान का दुष्कर नहीं है। 

यह सुन फैजी वहां से चलकर शिवपुरी पहुंचा महात्मा कबीर दास जी पत्र के पढ़ते ही अरब जाने को प्रस्तुत हो गए क्योंकि वह तो सबको ब्रह्ममय जानते थे। 

अरब पहुंच कर आप बादशाह के दरबार में पहुंचे बादशाह ने अति सत्कार किया महात्मा जी ने शहजादे की लाश को मंगाई और कहा कि उठ खुदा के हुक्म से परंतु वह ना उठा। 

दोबारा फिर कहा कि उठ कुदरत के हुक्म से परंतु फिर भी वह सजीव होकर ना उठा। 

अन्त में महात्मा जी ने कहा कि उठ मेरे हुक्म से 

भक्ति के प्रताप से शहजादे उठकर बैठा सजीव होने पर बादशाह अपने दल से मिला और महात्मा जी से कहा कि कुरान शरीफ में लिखा है जो फकीर खुदा से बड़ा बने वह मूर्ख दंड देने के काबिल है। 

आप भी खुदा से बड़े बने हो इस कारण दंड देना उचित है यह सुन कबीर दास जी ने कहा कि बादशाह आपकी अकल में फर्क है। क्योंकि अभी तक तुम को यह मालूम नहीं की भक्ति का ऐसा प्रताप है भगवान भक्त को अपने से बड़ा मानते हैं। 

भगवान अपना अपमान सह सकते हैं परंतु भक्त का अपमान नहीं सह सकते प्रमाण को ऋषि दुर्वासा और अंबरीश की कथा है। 

कलयुग में भगवान नाम ही सार है इस हेतु थोड़ा बहुत प्रेम पूर्वक नाम कीर्तन अवश्य करना चाहिए क्योंकि भव सिंधु से पार होने का यही एक उपाय है।


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